नमस्कार,
अभी कुछ दिनों पूर्व बेरमो के इतिहास से संबंधित थोडी जानकारी देने का मैंने प्रयास किया था। इसमें कुछ और बातों की ओर आप सबका ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा। वाराणसी यानी बनारस के बारे में ऐसा कहा जाता है, कि वहां पूरे भारतवर्ष के लोग निवास करते हैं। देश का ऐसा कोई प्रांत या राज्य नहीं, जहां के लोग वहां न मिलें। कहते हैं कि सभी प्रांतवासियों के वहां अलग अलग मोहल्ले हैं। दशाश्वमेध में बंगाली बंधु दिखेंगे, तोहनुमान घाट परिसर में कर्नाटक के लोग मिलेंगे। केदार घाट में आपको आंध्र-प्रदेश में होने की अनुभूति होगी। दुर्गा घाट में मराठी,राम घाट में गुजराती आदि। इतना ही नहीं उन इलाकों में आपको न सिर्फ दूकानों इत्यादि पर उन प्रांतीय भाषाओं में लिखे साइन बोर्ड दिखेंगे,बल्कि व्यापारी/दूकानदार भी उन्हीं प्रांतों के मिल जायेंगे। यह सब बताने का अभिप्राय इतना ही है,कि अपने बेरमो में भी कमोबेश ऐसी ही परिस्थिति देखने को मिलती है। पश्चिम बंगाल से सटा होने की वजह से बंग-बंधुओं का प्रचुरता मे होना तो लाजमी है। साथ ही उडीसा तथा छत्तीसगढ (जहां के निवासियोंको प्यार से हम "बिलसपुरिया"संबोधित करतेह)के निवासी भी बेरमो में बडी तायदाद में हैं पर गुजराती (जरीडीह बाजार),पंजाबी (सण्डे बाजार),मद्रासी (जवाहर नगर/सुभाष नगर) आदि भी कुछ ऐसी पैठ बना चुके हैं, मानो एक छोटा भारत बेरमो में समाया हुआ हो। आप सोच रहे होंगे मैंने महाराष्ट्र का जिक्र क्यों नहीं किया। बिलकुल ठीक सोच रहे हैं आप। फिटरटोला तथा पुराने बोकारो ऑफिस के पास वाले मोहल्ले में मराठी अच्छी खासी संख्या में थे। अब न सिर्फ वे मोहल्ले काल के गर्भ में समा गये बल्कि महाराष्ट्रीय (मराठी) लोग भी स्थलांतरित हो गये (जिनमें एक मैं भी हूं)।
मद्रासी यानी तमिलनाडुवासियों के बारे में अभी कुछ दिनों पूर्व एक रोचक जानकारी हासिल हुई है। यह जानकारी कि बेरमो में ये लोग कैसे आए। जब बेरमो परिसर की खदानों में अंग्रेजों का 'राज' था, तब सारे अधिकारी अंग्रेज ही थे, जो स्वाभाविक भी था। पर कामगार वर्ग, बाबू लोग भारतीय थे। कर्मचारी मिलते नहीं थे, सो नौकरी तब आसानी से मिल जाती थी, चाहे शिक्षा का अभाव ही क्यों न हो। ऐसे में कर्नाटक राज्य के कोलार गांव में अवस्थित सोने की खानों (जिन्हें कोलार गोल्ड फील्ड्स या KGF के नाम से जाना जाता है) में काम करने वाले वाले कर्मचारी जिनमें तमिलभाषी बहुतायत में थे, उन्हें अनुभव के आधार पर बेरमो बुलाया गया। चूंकि उन्हें खानों मे काम करने का अनुभव प्राप्त था,नौकरी पाने में कोई असुविधा न हुई। तबसे वे/उनके वंशज बेरमो में आकर बस गये। ये लोग प्रमख रूप से जवाहर नगर इलाके में निवास करते हैं। कोलार गांव चूंकि कर्नाटक-तमिलनाडु सीमा पर बसा है तथा आंध्र प्रदेश भी वहां से अधिक दूर नहीं है, वहां के निवासी शुद्ध तमिल नहीं बोलते। जाहिर है. जवाहर/सुभाष नगर भी इससे अछूता नहीं।
तो ऐसा हमारा बेरमो विविधता में एकता का प्रतीक या यों कहें भारत का प्रतिरूप है, जिसपर हमें नाज़ है, जो कि स्वाभाविक भी है।
धन्यवाद !
दीपक ग. राइरकर
वेस्टर्न कोलफिल्ड्स लिमिटेड
चन्द्रपुर (महाराष्ट्र)
वेस्टर्न कोलफिल्ड्स लिमिटेड
चन्द्रपुर (महाराष्ट्र)